मृत्यु भोज एक कुप्रथा, कोरोना के कारण अघोषित रूप से ब्रेक

मृत्यु भोज यानी दुख में डूबे परिवार के यहां सैकड़ों लोगों का समागम, लेकिन कोरोना के कारण लॉकडाउन के दौरान इस कुप्रथा पर अघोषित रूप से ब्रेक लग गया। सोशल डिस्टेंसिंग के कारण अब भी चंद लोगों की मौजूदगी में सादगी से सभी कर्मकांड हो रहे हैं। कई समाज भी इस मामले में पहल कर रहे हैं। सभी समाज इस बारे में निर्णय ले लें तो यह कुप्रथा हमेशा के लिए बंद हो सकती है। पितृ कर्म के प्राचीन स्थल उज्जैन के सिद्धवट पर पारंपरिक रूप से कर्म कराने वाले तीर्थ पुरोहित पं. राजेश त्रिवेदी का कहना है कि मृत्यु भोज शास्त्र सम्मत नहीं है। गरुड़ पुराण में मृत्यु भोज की जगह ब्राह्मण भोज का ही जिक्र है।


पंडित महेशलाल गुप्त कहते हैं “यजमान पर कोई प्रतिबंध नहीं है कि वह 11, 21 या 51 ब्राह्मणों को भोज कराए। यह सामर्थ्य और श्रद्धा पर आधारित है। यदि सामर्थ्य नहीं है तो एक ब्राह्मण को भी भोज करा सकते हैं। शास्त्र केवल ब्रह्मभोज का आदेश देते हैं। मृत्यु भोज की प्रथा को लेकर कई समाजों ने स्वयं निर्णय लेकर रोक लगाई है। हालाकि इसमें व्यक्ति स्वयं ही निर्णय लेने के लिए सक्षम है। इसमें न तो हमें कुछ कहने की जरूरत है और न किसी ओर को।

तीन उदाहरणों से जानिए लॉकडाउन ने किस तरह इस कुप्रथा पर ब्रेक लगाया…

1. पिता के समय 5 हजार काे खाना खिलाया था, अब घर के ही लाेग
देवास के अर्जुन नगर निवासी ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी छगनलाल पिपलाेदिया की पत्नी लक्ष्मी पिपलाेदिया का निधन 19 मार्च 2020 काे हाे गया। पिपलाेदिया बताते हैं कि काेराेना के चलते मृत्युभाेज निरस्त कर दिया। मात्र घर के ही लाेगाें काे भाेजन कराया। पिताजी का 21 जनवरी 2011 काे निधन हुआ था। उस समय मृत्युभाेज दिया था। करीब 5 हजार लाेगाें काे खाना खिलाया था, जिसमें डेढ़ लाख रुपए से ज्यादा का खर्च आया था 

2. पहले डेढ़ लाख खर्च हुए थे, इस बार लाेगाें का उधार चुकाया
पीपलरावां के भेरूलाल राठौर के पिता आनंदीलाल राठौर का 19 मार्च 2020 को निधन हुआ। मृत्युभोज 31 मार्च को लॉकडाउन की वजह से निरस्त कर दिया गया। 15 अक्टूबर 2018 को ही माताजी रामप्यारीबाई का निधन हुआ था। तब समाज अध्यक्ष होने के कारण मृत्युभाेज में 3 हजार लोगों को खाना खिलाया था। डेढ़ लाख रु. खर्च हुए थे। भेरूलाल राठौर बताते हैं कि आयोजन में लगने वाली राशि से पिता के पैरालाइसिस के इलाज के लिए लाेगाें से लिए गए उधार को चुकाया। 

3. रिश्तेदाराें काे ही नहीं बुलाया, परिवार के ही लाेग थे माैजूद
चापड़ा क्षेत्र के गांव अमरपुरा के सज्जनसिंह पटेल बताते हैं कि 2006 में उनकी नानीजी की मृत्यु हो गई थी। तब मृत्युभाेज में 9 हजार लाेगाें काे खाना खिलाया था। इसमें साढ़े 3 लाख रुपए खर्च हुए थे। लाॅकडाउन के दाैरान पिताजी भागीरथसिंह पटेल का निधन हाे गया। उनका मृत्युभाेज कार्यक्रम 2 मई काे हाेना था, लेकिन सिर्फ परिवार के 30 लाेगाें को ही खाना खिलाया। रिश्तेदार व परिचिताें काे भी नहीं बुलाया गया।

कुप्रथा पर विराम लगाने को आगे आएं

मृत्युभोज जैसी कुप्रथा पर कई समाजों ने रोक लगा रखी है लेकिन यह आज भी कायम है। लॉकडाउन ने सामाजिक तस्वीर बदल दी है। यह समाज के लिए अच्छा संकेत है। इससे उन गरीबों को हिम्मत मिली है, जो ऐसा करने और इतने लोगों का भोज कराने में समक्ष नहीं हैं। यह इस लिहाज से भी बेहतर है कि एक तो अपने को खोने का गम में डूबे परिवार को मृत्यु भोज के नाम पर इतना आर्थिक बोझ नहीं उठाना पड़ा।

यदि लॉकडाउन में मृत्यु भोज नहीं हो सकता है तो इसे हम हमेशा के लिए बंद करने का निर्णय क्यों नहीं ले सकते? समाज हित में भास्कर का मानना है कि मृत्यु भोज जैसी कुप्रथा को हमेशा के लिए खत्म करने सभी समाजों को आगे आना चाहिए। जरूरत है समाज स्तर पर इस बारे में ठोस निर्णय लेने और उसे प्रचारित करने और लागू करने की। सामाजिक बदलाव का यह बेहतर मौका है।

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