मजदूर पिता ने बेटे के इलाज के लिए जुटाए सवा दो करोड़, आज विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

भोपाल। किसी मध्यमवर्गीय पिता के बेटे को कोई गंभीर बीमारी हो जाए और इलाज का खर्च सवा दो करोड़ रुपये हो तो स्वाभाविक है कि पिता टूट जाएगा, लेकिन मजदूरी करने वाले भोपाल के 31 वर्षीय सागर मेश्राम ने टूटकर बिखरने के बजाय प्रेम, जिद, साहस और जुनून की एक अलग ही कहानी लिख डाली है।

इस मजदूर पिता ने दिल की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित सात साल के बेटे की जिंदगी बचाने के लिए दिन-रात एक कर तीन साल में सवा दो करोड़ रुपये दान के जरिए जुटा लिए।

हाल ही में 05 अप्रैल को उस राशि से अमेरिका के बोस्टन शहर स्थित चिल्ड्रन अस्पताल में बच्चे की सर्जरी करवा ली

अब बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ है। सागर के संघर्ष की यह कहानी एक पिता के वात्सल्य के तौर पर नजीर तो है ही, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और गंभीरता की भी अद्भुत कहानी है।

सागर बताते हैं कि उन्होंने बेटे के उपचार के लिए दान जुटाने हेतु शहर के चौराहों पर पोस्टर चिपकाए। रेड सिग्नल पर खड़े वाहन सवारों को पर्चे बांट कर दान मांगा। कई लोगों ने मजाक भी उड़ाया तो कई ने दुत्कारा, लेकिन ये पिता अपमान सहकर भी डटा रहा।

दरअसल, फोर्टिस अस्पताल के डॉक्टरों ने कह दिया था कि ‘बच्चे को डबल आउटलेट राइट वेट्रिकल विद लार्ज मस्कुलर वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट नामक दिल की बीमारी है। इसमें दिल और फेफड़े के बीच बड़ा छेद हो जाता है। खून का दबाव बढ़ने से फेफड़े खराब हो जाते हैं। साफ और गंदा खून मिलने लगता है। इलाज नहीं हुआ तो बच्चा 10 साल से ज्यादा जीवित नहीं रहेगा। इसका इलाज अमेरिका में होगा और कुल मिलाकर खर्च आएगा करीब सवा दो करोड़ रुपये।’ इसके बाद पिता ने ठान लिया कि समाज से दान जुटाकर बेटे का उपचार करवाऊंगा।

साढ़े तीन साल में जुटा लिया पैसा

सागर ने पैसा जुटाने के लिए दिन-रात एक कर दिए। रात भर पंपलेट बनाते और दिन में सार्वजनिक जगहों पर चस्पा करते। इंटरनेट मीडिया पर लोगों से अपील करते।

आखिरकार उन्हें सफलता मिली और विभिन्न माध्यमों से छोटे-छोटे दान के जरिए साढ़े तीन साल में करीब सवा दो करोड़ 75 लाख रुपये एकत्र हो गए। इसमें देश-विदेश के करीब साढ़े सात हजार लोगों के अलावा मध्य प्रदेश सरकार ने भी 50 लाख रुपये दिए।

इस राशि से बीते सोमवार (पांच अप्रैल) को अमेरिका के बोस्टन चिल्ड्रन अस्पताल में प्रियांशु की सर्जरी हो गई। सागर के मुताबिक, डॉक्टरों ने कहा है कि सर्जरी सफल रही है और बेटा खतरे से बाहर है।

भगवान बनकर आया वो शख्स

सागर ने बताया कि उनकी पत्नी गृहिणी हैं। प्रियांशु के अलावा दो बेटियां हैं। मजूदरी के अलावा आमदनी का कोई जरिया नहीं था। ऐसे में कभी पुताई तो कभी पिज्जा डिलीवरी का काम किया।

इसी दौरान कैंसर मरीजों के इलाज में मदद करने वाले गौरव मल्होत्रा संपर्क में आए। उन्होंने प्रियांशु को बचाने के लिए अभियान चलाने में मदद की। चौराहों पर मानव श्रृंखला बनवाई और इंटरनेट मीडिया के जरिए दान जुटाने में भी मदद की।

प्रियांशु को दिल की दुर्लभ बीमारी थी। खराब खून फेफड़े में पहुंचने से जिंदगी लंबी नहीं रहती। ऐसे पिता को सलाम है, जिसने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार उसके बेटे की सर्जरी हो गई है। उसने ऐसा काम किया है कि उसके संघर्ष पर फिल्म बन सकती है।

– डॉ. राकेश मिश्रा, शिशु रोग विशेषज्ञ, भोपाल


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

इसे भी पढ़े

google-site-verification=I1CQuvsXajupJY4ytqNfk1mN82UWIIRpwhZUayAayVM